सोमवार, 19 मई 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं



बीत गए थे जो फिर से क़िस्से दुहराने वाले हैं
शोर बड़ा घनघोर है ये अच्छे दिन आने वाले हैं

अभी समझ की देहरी तक जो पहुँचे हैं मुश्किल से
उन नादानों के फिर से सपने भरमाने वाले हैं

देख-भाल के सोच-समझ के खाद-पानी ये डाला है
नागफनी के पौधों से आलम हरियाने वाले हैं

फूल दिखा कर सुंदरता का भरम बनाये रखा है
मिलते ही मौक़ा मुँह  कीचड़ मल जाने वाले हैं

सुबह-ओ-शाम रात-दोपहर हमने जिसको बीना है
उस चादर पर तेल छिड़क लपटें उठवाने वाले हैं

औरत देवी घर की ज़ीनत मैला धोना पुण्य का काम
मनु-सूत्र को वो फिर से जड़ में रखवाने वाले हैं

क्या होगा, कैसे होगा, ये मत पूछो बिलकुल भी
सारे मिलकर भजन करो अच्छे दिन आने वाले हैं.

बुधवार, 14 मई 2014

लोकसभा चुनाव में टूटते भ्रम

(हमज़बान के लिये 13 मई 2014 को लिखा गया आलेख)

- रजनी साहिल

16 मई को जो अद्भुत नज़ारा पेश होने जा रहा है वह ऐतिहासिक साबित होगा या नहीं यह तो उसी दिन पता चलेगा, लेकिन इस नज़ारे के तैयार होने के पीछे की कहानी ज़रूर आने वाले वक़्त में याद की जाएगी। एक नहीं कई वजहों से। इस बार के लोकसभा चुनाव में कई ऐसे भ्रम जिनका गुब्बारा बहुत पहले से ही फुला लिया गया था, चुनाव ख़त्म होने से पहले ही टूट चुके हैं, फिर चाहे वह मुद्दों की ज़मीन पर पैदा किया गया भ्रम हो, चुनावी समीकरणों में बदलाव का भ्रम हो, या मीडिया की निष्पक्षता का भ्रम हो। इसके अलावा यह चुनाव राजनीतिक दाँव-पेंचों के स्तर में गंभीर गिरावट के लिए भी याद किया जाएगा। 

इस बात में कोई दो राय नहीं है इस बार का चुनाव मुख्यतः भाजपा और कांग्रेस के बीच के चुनाव की तरह दिखाया गया है। चर्चा के काबिल जिस तीसरी पार्टी को माना गया वह आआपा है। इसलिए जाहिर है कि जिसे ज़्यादा दिखाया गया है उस पर बातें भी अधिक होंगी। अगर चुनाव की शुरुआत से लेकर अब तक के भाषणों पर गौर करें तो कोई भी समझ सकता है कि जिन वादों और सपनों से शुरुआत की गई थी, वह हाथी के दाँत थे, सिर्फ़ दिखाने भर के। चुनाव का अंतिम चरण आते-आते वह वादे, वह सपने कहाँ ग़ायब हो गए और उसकी जगह कैसे एक-दूसरे पर आरोप लगाना, जाति, धर्म, सम्प्रदाय और अहं आ गए इस तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। उनका तो ध्यान न के बराबर जाते हुए दिखा जो शुरुआती वादों की वजह से किसी के समर्थन में उतरे थे। और इस सब में भाजपा इतनी आगे रही कि अन्य दलों का समय भाजपा को ग़लत साबित करने में ही खपता रहा. चाहे चुनावी रैलियों में दिये गये भाषण हों या न्यूज़ चैनलों में दिखाई गई बहसें एक-दूसरे पर आक्षेप लगाने और खुद को सही साबित करने के अलावा मूल मुद्दों पर बहस न के बराबर ही दिखाई दी है। यहाँ तक कि किस पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र में क्या है, इस तक पर कोई गंभीर बहस सामने नहीं आई। आई होती तो संभवतः लोगों को समझ आता कि कांग्रेस की जिन नीतियों को कोसती हुई भाजपा खड़ी है, उसकी अपनी नीतियाँ भी एक अलग कलेवर में तकरीबन वैसी ही हैं। तीसरी चर्चित पार्टी के रूप में उभरी आआपा ने भी कांग्रेस और भाजपा के तौर-तरीकों, कार्यप्रणाली के दोष तो गिनाए पर उनकी अपनी क्या नीति है वे भी यह स्पष्ट नहीं कर पाए। 

यह बहुत स्पष्ट है कि अधिकांश मतदाताओं की नज़र से लिखित घोषणा-पत्र नहीं गुज़रता। वे उम्मीदवारों के भाषणों और वादों में ही नीतियाँ तलाशते हैं और उन्हीं से मुतासिर होकर अपना समर्थन देते हैं। टीवी पर या समाचार-पत्रों में इन समर्थकों के विचारों और जानकारी पर चर्चा का स्थान बहुत कम है। इस कमी को दूर किया सोशल-मीडिया ने। फेसबुक जैसा सोशल मीडिया इन दिनों अलग-अलग पार्टी के समर्थकों और उनकी समर्थन पोस्टों से भरा पड़ा है। लेकिन जैसे ही आप इनसे संबंधित पार्टी की भविष्य की योजना, नीतियों या घोषणा-पत्र में शामिल किये गए मुद्दों पर बात करने की कोशिश करते हैं तो सौ में से कोई एक-दो होते हैं जो इस पर बात करते हैं, जिन्हें इसके बारे में पता है। बाकी समर्थक या तो बगलें झांकने लगते हैं या फिर इधर-उधर से कोई दूसरा बिंदु उठाकर बहस शुरू कर देते हैं। यह समर्थन असल में एक व्यक्ति विशेष में आस्था की तरह है। भाजपा समर्थकों को लगता है कि मोदी सब कुछ ठीक कर देंगे, आआपा समर्थकों को लगता है कि केजरीवाल सब कुछ ठीक कर देंगे। पर कैसे? इसका जवाब उनके पास नहीं है। इस मामले में कहना पड़ेगा कि कांग्रेस और उसके समर्थकों का एक बड़ा वर्ग इस पचड़े से सुरक्षात्मक दूरी बनाए रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भाजपा या आआपा की तरह बेलगाम कैम्पेनिंग और बहसें नहीं कीं। फिर भी अगर कल्पना की जाए कि सोशल मीडिया पर मौजूद समर्थक एक सरकार चुनेंगे तो जो तस्वीर सामने आती है वह यह है कि ऐसे लोगों का बड़ा वर्ग सरकार चुनेगा जिसे यह भी नहीं पता कि किस पार्टी की क्या नीति और मुद्दे हैं। 

सोशल मीडिया से निकलकर जब अन्य मीडिया माध्यमों की तरफ झांकते हैं, ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ़ जिस पर ताज़ा और सही ख़बरों के मिलने की उम्मीद दर्शकों को ज़्यादा होती है, तो और भी गंभीर तस्वीर दिखाई देती है। बिना किसी गंभीर विश्लेषण के भी समझा जा सकता है कि यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का वह दौर है जिसमें राजनीतिक ख़बरों के मामले में तो कम से कम उसने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। यह साफ दिखता है कि उसने संतुलन नहीं बनाया है। अपने समय का 80 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा उसने भाजपा को दिया है। बाकी समय में कांग्रेस और आआपा की गतिविधियाँ दिखाई हैं। सपा, बसपा, आरजेडी, जेडीयू, टीएमसी जैसे बड़े दलों का तो जैसे कोई अस्तित्व ही नहीं था उसके लिए। जब तक इन दलों से संबंधित प्रदेशों में मतदान की तारीख नहीं आ गई टीवी पर इनकी गतिविधियां नदारद ही रहीं। वामपंथी दलों के साथ-साथ दक्षिण भारत के राज्यों और वहाँ मौजूद दलों से तो लगभग अस्प्रश्य जैसा व्यवहार किया गया है। वहाँ क्या चल रहा है उसके बारे में आज तक टीवी पर कोई ठीक-ठाक ख़बर दिखाई नहीं दी है। नरेन्द्र मोदी की रैलियों, भाषणों के कई-कई रिपीट टेलीकास्ट और अन्य दलों की गतिविधियों को आधा-एक घंटे में निपटा देने के रवैये और मोदी लहर के गुब्बारे में हवा भरने ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छवि पर जो बट्टा लगाया है, उसने उस नींव को हिला दिया है जिसके बूते कहा जाता था कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।

जहाँ तक मुद्दों की राजनीति और राजनीतिक गंभीरता की बात है तो वह न सिर्फ समर्थकों में बल्कि प्रमुख राजनीतिक दलों में भी नदारद नज़र आती है। अपनी नीतियों या योजनाओं को जनता के सामने रखने की ज़िम्मेदारी संबंधित दलों और उनके प्रत्याशियों/नेताओं की होती है, पर वे तो एक-दूसरे की टोपी उछालने में लगे हैं। शुरुआत से ही इसे नरेन्द्र मोदी और राहुल गाँधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के चुनाव के रूप में प्रस्तुत किया गया, बावजूद इसके कि कांग्रेस ने कभी राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री होने का हवाला नहीं दिया। यहीं से यह चुनाव लोकसभा चुनाव कम भाजपा और कांग्रेस के बीच खानदानी दुश्मनी की तरह अधिक हो गया। ऐसे युद्ध की तरह हो गया जिसे जीतने के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है। एक राजनीतिक दल द्वारा दूसरे दल पर आरोप लगाना, उसकी आलोचना करना और उसकी नीतियों/कार्यप्रणाली की खामियों पर टिप्पणी करना चुनाव में कोई नयी बात नहीं है, लेकिन इस बार इन सबके बहाने व्यक्तिगत हमले किये जा रहे हैं। जो चुनाव जनता की समस्याओं, जनता के मुद्दों पर लड़ा जाना था वह युवराज’, ‘माँ-बेटे की सरकार’, ‘दामाद जी’, ‘हिटलर’, ‘मौत का सौदागर’, ‘हनीमून’, ‘नीच राजनीति’, ‘नीच जातिजैसे जुमलों की भेंट चढ़ गया। वाड्रा, अंबानी, अडानी, स्नूपगेट के बहाने किसानों, भूमि अधिग्रहण, महिला सुरक्षा/अधिकारों के जो महत्वपूर्णमुद्दे उठे, वे भी इन जुमलों और व्यक्तिगत हमलों की गर्द में दब गए। कुल मिला कर इस चुनाव का अंत भी ढाक के तीन पात जैसा रहा। इस बात पर बड़ा जोर दिया गया था कि यह चुनाव मुख्यतः विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केन्द्रित होगा लेकिन हुआ क्या, अंत तक आते-आते विकास और भ्रष्टाचार का मुद्दा कहीं पीछे रह गया और व्यक्तिगत चरित्र पर आकर टिक गया। पिछले चुनावों की तरह साम्प्रदायिकता, जाति समीकरण भी आ ही गए। हालांकि आआपा शुरुआत से अंत तक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर टिकी हुई है, वह अब भी व्यवस्था में सुधार की बात करती है और उसे व्यापक जन समर्थन भी हासिल है लेकिन सीटों के अनुपात के मद्देनज़र कांग्रेस, भाजपा को केन्द्र की राजनीति में बराबर की टक्कर देने और इस तस्वीर से बाहर करने में उसे अभी काफी वक्त की दरकार है।

इस बात की भी काफी हवा थी कि यह चुनाव जाति, धर्म, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रधानमंत्री पद के दावेदार द्वारा कई तरह की टोपियां पहनने के बाद कहना कि अपीज़मेंट पॉलिटिक्स नहीं करता,  मंच पर राम की तस्वीर का इस्तेमाल करने, अपनी नीच जात का हवाला देने और उनके दल के अन्य नेताओं द्वारा कहे गये बदला लेंगे’, ‘विरोधी पाकिस्तान भेजे जाएंगे’, ‘आतंकवादियों का गढ़जैसे जुमलों के निहितार्थ क्या हैं ये कोई भी दिमागदार व्यक्ति समझ सकता है। साफ़-साफ़ साम्प्रदायिक नज़रिया झलकता है। जहाँ तक जाति समीकरण की बात है तो अलग-अलग राज्यों से आई ऐसी कई ख़बरें हैं जो प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कहीं दर्ज नहीं हुईं लेकिन जो स्पष्ट करती हैं कि इस चुनाव में जाति एक महत्वपूर्ण कारक की भूमिका निभा रही है। बिहार में लालू प्रसाद यादव के दोबारा मजबूती हासिल करने, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती को हासिल होने वाली सीटों के क़यास, मुख़्तार अंसारी की मौजूदगी में बनारस के मुसलिम वोटों को लेकर लगाए जा रहे क़यास ही यह साबित करते हैं कि जाति आधारित वोटों की राजनीति कहीं नहीं गई। जब प्रधानमंत्री पद का घोषित दावेदार नीच राजनीतिका उल्लेख करते जुमले को अपनी नीच जाति पर हमले में बदल सकता है तो स्थानीय स्तर पर जाति की राजनीति का क्या स्तर होगा और सभी दल उसमें किस हद तक लिप्त होंगे इसकी बस कल्पना भर की जा सकती है।

कुल मिला कर यह चुनाव पिछले चुनावों से किसी कदर अलग नहीं है। न ही यहाँ मुद्दों की राजनीति हुई है और न ही वोटर को जाति, धर्म से अलग करके देखा गया है। जिन भी बिंदुओं को लेकर इस चुनाव के पिछले चुनावों से अलग होने की बात की जा रही थी, वे बिंदु वास्तविक धरातल पर कहीं नज़र नहीं आ रहे। चुनाव की शुरुआत के वक़्त जिन गुब्बारों में हवा भरी गई थी, उनकी हवा परिणाम आने के पहले ही निकलती जा रही है। एक-एक कर भ्रम टूटते जा रहे हैं।

मंगलवार, 6 मई 2014

तालाब ने बुलाया था


कल लल्लन मियाँ को पुलिस पकड़ कर ले गई। रात भर थाने में रखा और सुबह छोड़ दिया। वे रात को 12 बजे शहर से सटे तालाब पर अकेले भटक रहे थे, जब पुलिस ने उन्हें पकड़ा। अब पकड़ा या धर दबोचा ये तो पुलिस जाने या लल्लन मियाँ, पर किस्सा मजेदार था जो उन्होंने बताया।

लल्लन मियाँ बोले- भाई मियाँ वक़्त होगा यही कोई बारह-साढ़े बारह बजे रात का। हम तालाब के किनारे बैठे पानी में झिलमिलाती हुई शहर की बिजली वाली बत्तियों को देख रहे थे और बीच-बीच में पास पड़ा हुआ कोई कंकर उठाकर हौले से पानी में फेंक देते थे। कसम से बड़ा ही सुकून मिल रहा था। फिर देखते क्या हैं कि एक मोटरसाइकिल आकर थोड़ी दूर रुकी। दो पुलिस वाले उतरे और पास आते ही घुड़कने लगे। नाम, पता वगैरह के बाद उन्होंने पूछा, ‘यहाँ क्या कर रहे हो?’ जब हमने जवाब दिया कि तालाब ने बुलाया था, तो ऐसे देखने लगे जैसे हम कोई अजूबा हों। एक बोला - ‘अबे गाँजा पिये है क्या?’ हमने कहा, ‘नहीं भाई, बिलकुल सच, तालाब ने ही बुलाया था।’ वो बिदक गया, ‘तू ज़रूर गाँजा पिये है या फिर कोई गोली-वोली डटाए है। अबे तालाब की ज़ुबान होती है भला! वो भी कभी किसी को बुलाता है! सच-सच बता क्या करने आया है?

भाई मियाँ, हमें लगा कि कुछ नहीं बोलेंगे तो पिटेंगे, बोलने में ही भलाई है। हमने समझाने की कोशिश की। कहा कि 'भाई साहब जैसे गंगा मैया बुलाती है, वैसे ही तालाब भी बुलाता है।’ इस बार दूसरा वर्दीधारी बोला, ‘क्या बकवास करता है? और अगर इसने तुझे बुलाया तो हमें सुनाई क्यों नहीं दिया?’ हमने कहा, ‘बकवास नहीं साहब, एकदम सच। अब देखिए एक आदमी को गंगा मैया ने बुलाया और वह बेचारा गुजरात से भागता बनारस पहुँच गया। कहाँ बनारस, कहाँ गुजरात। सोचिए गंगा मैया को कितनी ताक़त लगानी पड़ी होगी, कितनी जोर से बुलाया होगा? लेकिन उस आदमी के अलावा किसी को सुनाई नहीं दिया। फिर ये तो अपने ही शहर का तालाब है, हमारे घर से ज़्यादा दूर भी नहीं है। इसे तो जोर लगाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी होगी, धीरे-से ही पुकारा होगा। अब जब गंगा मैया की जोर की आवाज़ किसी को सुनाई नहीं दी तो इसकी धीमी आवाज़ किसी को क्या सुनाई देती।’

दोनों पुलिस वालों की शक्ल से लग गया कि उन्हें हमारी बात का यकीन नहीं हो रहा है सो हमने कहा, ‘भाई साहब! इसमें हैरानी की क्या बात है। जब उस आदमी ने कहा कि उसे गंगा मैया ने बुलाया है तो सारे मुल्क ने यकीन कर किया। हम तो बाकी सब से कह भी नहीं रहे, बस आप दोनों से कह रहे हैं कि तालाब ने बुुलाया था तो आपको यकीन कर लेना चाहिए।’ इस पर पहले वाला फिर बिदक गया। बोला, ‘अब तू सिखाएगा हमें कि क्या करना चाहिए। पता नहीं काहे का नशा किये बैठा है और पिनक में लैक्चर पेल रहा है। स्साले दो झापड़़ पड़ेंगे तो सारा नशा हिरन हो जाएगा। बता क्या नशा किया है?’ हमने उन्हें खूब समझाया कि कोई नशा नहीं किया है, पर वे न माने।

थोड़ी देर बाद दूसरा पुलिस वाला पहले वाले से फुसफुसाकर बोला, ‘अबे चुनाव का टैम है, साला कहीं कोई वारदात-आरदात करने के इरादे से तो नहीं आया? कहीं-कुछ हो-हवा गया तो फोकट में 24 घंटे की ड्यूटी बजानी पड़ेगी।’ फिर हमसे मुखातिब होकर बोला, ‘बोल क्यों आया है यहाँ?’ हमने जबाब दिया, ‘हम खुद नहीं आए’ तो उसने दूसरा सवाल दागा, ‘फिर किसने भेजा है तुझे?’ हमने कहा, ‘हमें यहाँ किसी ने नहीं भेजा।’ वो भड़का, ‘तो फिर यहाँ कर क्या रहा है?’ हमने फिर दोहराया, ‘हमें तो तालाब ने बुलाया था।’

(कल्पतरु एक्सप्रेस, 6 मई 2014)
इस पर तो भाई मियाँ पंगा ही पड़ गया। एक पुलिस वाला दूसरे से बोला, ‘ये ऐसे नहीं मानेगा। ले चलो इसको थाने। रात भर में अकल ठिकाने आ जाएगी। कमबख़्त इतनी रात में तालाब के जीव-जन्तुओं की नींद अलग ख़राब कर रहा है।’ हमने विरोध किया, ‘अरे भाई जब गंगा मैया के बुलाने पर एक आदमी इतनी भीड़ के साथ वहाँ पहुँचा और किसी की नींद ख़राब नहीं हुई तो हम तो यहाँ अकेले आए हैं।’ 

उन्होंने एक न सुनी। सारी रात हमें थाने में रखा भाई मियाँ और सुबह हिदायत देकर छोड़ दिया कि लल्लन मियाँ रोजी-रोटी में खटने वाले आदमी हो, पुलिस और कानून की आवाज़ सुना करो। तालाब-वालाब की आवाज़ के चक्कर में न पड़ो ये सब बड़े लोगों के कारोबार हैं।

शुक्रवार, 2 मई 2014

यह निजता पर हमला है

बात मानसिकता और अधिकारों की है

------------------------------------------

प्रेम का स्वीकार एक सहज स्वाभाविक बात है, लेकिन दिग्विजय सिंह की स्वीकारोक्ति के बाद सोशल मीडिया और ख़ासकर फेसबुक पर जिस तरह से उनके प्रेम का चर्चा और उस पर टिप्पणियों का तांता लगा है उसने एक स्वाभाविक-सी बात को अस्वाभाविक बना दिया है. अस्वाभाविक इस अर्थ में कि कुछ लोग इस नितांत निजी मामले को राजनीतिक रूप देने की कोशिश में लगे हैं, कुछ इसके बहाने दिग्विजय सिंह का चरित्र हनन करने में जुट गए हैं और कुछ सामाजिक मर्यादाओं की झंडाबरदारी में उनकी निजता पर हमला कर रहे हैं. इसमें मोदी समर्थकों, कांग्रेस विरोधियों की संख्या तो काफी है ही पत्रकारों की संख्या भी कम नहीं है. जिस भद्दे ढंग से इस मामले में टिप्पणियां की जा रही हैं, तस्वीरें साझा की जा रही हैं उसमे सबसे आपत्तिजनक पहलू यह है कि इसमें एक महिला के सम्मान और उसकी निजता का भी मखौल उड़ाया जा रहा है. जो लोग सम्बंधित महिला के बारे में जानते तक नहीं वे भी उसके बारे में अनर्गल बातें कर रहे हैं. कुल मिलाकर यह सिवाय किसी की निजता में जबरन दखल देने और महिला के अपमान के अलावा और कुछ नहीं है.

अब बात यह कि आखिर दिग्विजय सिंह और उनकी महिला मित्र ने ऐसा क्या अपराध कर दिया है? वे न केवल पूरी ईमानदारी से अपने रिश्ते को स्वीकार कर रहे हैं बल्कि उसे सामाजिक व वैधानिक मान्यता प्रदान करने की ओर भी अग्रसर हैं. वे चाहते तो इसे अपना निजी मामला कहकर चुप रह सकते थे, पर दोनों ने ही ऐसा नहीं किया. क्या इसी से स्पष्ट नहीं होता कि दाल में कहीं भी कुछ भी वैसा काला नहीं है जिसकी सम्भावना अक्सर तलाशी जाती है. न तो प्रेम करना कोई अपराध है, न तलाक़ लेना और न ही विवाह करना. उम्र का हवाला देकर भी आप उनकी ईमानदार स्वीकारोक्ति को किसी कठघरे में नहीं खड़ा कर सकते. फिर आखिर इस तरह किसी की निजता पर हमला करके क्या साबित करने की कोशिश की जा रही है? ऐसा करने वालों की मंशा चाहे जो भी हो पर इससे उनका ही मानसिक दीवालियापन साबित होता है.

किसी का विरोध करने के कई तरीके होते हैं. जो लोग दिग्विजय सिंह से राजनीतिक मतभेद रखते हैं या व्यक्तिगत रूप से उन्हें पसंद नहीं करते और इस बात को उनके खिलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें विरोध की सीमा-रेखा का ध्यान रखने की ज़रूरत है. मैं दिग्विजय सिंह का समर्थक नहीं हूँ, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं उनके नि:तांत निजी संबंधों (जिन्हें कि वे क़ानूनी मान्यता देने की भी बात कह रहे हैं) की छीछालेदर करूँ और उस महिला का मखौल उड़ाऊँ जो अपना जीवन एक नए सिरे से शुरू करना चाहती है. इस प्रकार की हरकतें महिलाओं के प्रति आपकी संवेदनशीलता के स्तर को भी दर्शाती हैं. असल में इस तरह की अशोभनीय टिप्पणियां करने वाले लोग वही हैं जिनके घरों की महिलाओं को कोई देख भर ले तो उसका सिर उतारने पर आ जाते हैं लेकिन बाकी सभी महिलाओं को खुद भी मनोरंजन का सामान समझते हैं. चाहे वे किसी के भी समर्थक, विरोधी होने का मुखौटा पहन लें, कितना भी बड़ा पत्रकार होने का तमगा लटका लें, इससे चरित्र नहीं बदल जायेगा. इस मामले में जिस ढंग से चटखारे लेकर बातें की जा रही हैं वह भीतर छुपी लार-टपकाऊ नीयत, महिलाओं के प्रति घटिया सोच और दोगले व्यवहार को दर्शा ही देती हैं. गपशप (गॉसिप) के प्रति दिलचस्पी तो स्वत: ही दिख जाती है.

इन टिप्पणियों का विरोध करने पर कुछ लोगों ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि मोदी के विवाहित होने की ख़बर पर और दिग्विजय सिंह के मामले में अलग-अलग रुख क्यों? उनके लिए एक ही जवाब है कि बिलकुल भी अलग-अलग रुख नहीं है, हम तब भी अधिकार की बात कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं. हम तब भी एक महिला के अधिकारों की हिमायत कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं. फर्क है तो इस बात का कि मोदी ने एक महिला के विवाहोपरांत अधिकारों को नकार दिया, सामाजिक व वैधानिक मान्यता होते हुए भी उसे उसके अधिकारों से वंचित रखा और एक स्त्री के पूरे अस्तित्व को नकारते हुए अपने अविवाहित होने का भ्रम फैलाये रखने में अहम् भूमिका निभाई. जबकि दिग्विजय सिंह उन तमाम अधिकारों को सामाजिक/वैधानिक मान्यता प्रदान करने की बात खुद कर रहे हैं, किसी जवाबदेही से पीछे नहीं हट रहे हैं. अब अगर आप अधिकारों/वैधानिक मान्यता को नकारने और प्रदान किये जाने का फ़र्क ही न समझते हों तो बात अलग है. दूसरी बात यह कि प्रश्न खड़े करने और मखौल उड़ाने में फ़र्क होता है. यदि किसी ने मोदी की निजता का मखौल उड़ाया है तो वह भी निंदनीय है.

यहाँ एक और गंभीर बात यह है कि न केवल दिग्विजय सिंह और उनकी महिला मित्र की निजता का मखौल उड़ाया जा रहा है बल्कि अपरोक्ष रूप से उस तीसरे व्यक्ति को भी हलकान किया जा रहा है जिससे तलाक़ की अर्जी दाखिल-दफ़्तर है. क्या यह शर्मनाक और दु:खद नहीं है कि ऐसी अभद्र टिप्पणियों और ख़बरों के चलते उस व्यक्ति को व्यथित मन से अपनी ज़िन्दगी की नि:तांत निजी बात सार्वजनिक करनी पड़ती है कि तलाक़ की अर्ज़ी में उसकी भी सहमति है और दोनों के बीच पहले ही संबध-विच्छेद हो चुका है. इस मामले में उस इंसान की समझदारी उन तमाम टिप्पणियों और ख़बरों को प्रसारित करने वालों का मुंह बंद करने के लिए काफ़ी है, जो बिना कोई पृष्ठभूमि जाने उस महिला के सन्दर्भ में अनर्गल बातें कर रहे हैं. लेकिन बड़ा मसला यहाँ मुँह बंद करना नहीं कुछ और है.

बात मोदी या सिंह की नहीं है, बीजेपी या कांग्रेस की नहीं है और न ही मुँह बंद करने की है. बात है उस मानसिकता की जिससे आप आज तक उबर नहीं पाए हैं और जिसके चलते आज तक महिलाओं का और किसी की निजता का सम्मान करना नहीं सीख पाए हैं. महिलाओं के प्रति तो इस हद तक असंवेदनशील बने हुए हैं कि आज भी महिलाओं को घर के भीतर रखने की सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं जिसका परिणाम है कि कामकाजी महिलाओं को एक अलग ही नज़रिए से देखा जाता है और यह स्वीकार करने में परेशानी होती है कि कोई स्त्री बिना किसी स्वार्थ के अपने से कहीं अधिक उम्र के पुरुष से प्रेम कर सकती है. यही हाल हमारे दोहरे चरित्र का है. महिलाओं के विरुद्ध किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के बयान पर उँगलियाँ उठाते हैं लेकिन निजी जीवन में रोज़ कितनी बार महिला-विरोधी शब्दों/जुमलों का इस्तेमाल करते हैं इसका ख़याल भी नहीं रखते और न ही यह सोचते हैं कि ऐसा क्यों कर रहे हैं. वजह सिर्फ यही है कि हम उस मानसिकता के साथ ही बड़े हुए हैं जिसमे खुद की ग़लतियाँ भी जायज़ हैं, दूसरा करे तो उसकी खैर नहीं. जब तक इस मानसिकता से नहीं उबरा जायेगा हमारे सभ्य होने के दावे झूठे ही रहेंगे. पढ़-लिख लेने भर से, कोट-टाई पहन लेने से, संस्कृति की ध्वजा भर उठा लेने से ही कोई सभ्य नहीं हो जाता. इसकी सबसे पहली शर्त दूसरों के अधिकारों और जीवन का सम्मान करना है.

02 मई 2014, दैनिक जनवाणी, मेरठ 
बहरहाल, जिन पत्रकार बंधुओं ने इस मामले में अशोभनीय व्यवहार किया है उनसे अतिरिक्त रूप से यही कहा जा सकता है कि पत्रकार होने, हाथ में माइक या कलम पकड़ लेने, सूचनाओं तक आपकी पहुँच होने से आपको ये अधिकार नहीं मिल जाता है कि आप किसी के भी निजी संबंधों की छीछालेदर करें. अपनी सीमा रेखा को पहचानिए वरना करते रहिये देश/दुनिया को बदलने के दावे, कुछ नहीं बदलेगा. फिर कल को अगर आपकी निजता पर कोई हमला हुआ तो कितना भी करते रहिएगा अपनी निजता के अधिकार का हल्ला, जैसे आज आप नहीं समझ रहे कल को कोई आपकी स्थिति नहीं समझेगा.

- रजनीश 'साहिल'
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.