शुक्रवार, 22 मार्च 2013

ये भी कोई काम हुआ


चुपके-चुपके दिन बीता, चुपके से ही रात ढली
जब भी अपना ज़िक्र चला, ख़ामोशी ही साथ चली

अब इतने दरवाज़े हैं, कातिल जाने किससे निकला
ख़्वाब बेचती मजलिस में, मुझको ज़िंदा लाश मिली

झोले में हर चीज भरी है, नींद से ले के ख़्वाब तलक
क्या हासिल है इसका जब, धज्जी-धज्जी रात मिली

मैं सोचूँ उनके कहने से, लिखूँ तो उनके अल्फ़ाज़
ये भी कोई काम हुआ, इससे तो बेगार भली

नक़्श-ए-पा बाज़ारी के, हैं जो गहरे तो भी क्या
जो भी इनकी राह चला, आख़िरकर तो मात मिली

इक दिन तो ऐसा आए, लरज़े न धमके आवाज़
कहते-कहते हाँ जी हुज़ूर, किसको कितनी ख़ैरात मिली.


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