शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

दरम्यां दीवार ज़रा सी



चूंकि थोड़ी रूमानियत हर किसी में होती है... 

आई ग़मे हिज़्रां में रफ़्तार ज़रा सी
होती है चश्म-ओ-अश्क में तक़रार ज़रा सी

याद-ए-यार आए तो दुनिया के वास्ते
रहती है तबीअत भी बीमार ज़रा सी

न शौक़-ए-वस्ल था हमें न आरज़ू-ए-दीद
उठी है फिर भी दरम्यां दीवार ज़रा सी

अच्छे बने तो अच्छों को अच्छे नहीं लगे
आदत भी रहनी चाहिये बेकार ज़रा सी

आसां हो रहगुज़र तो फिर क्या मज़ा ‘साहिल
मंज़िल भी चुन के देखिये दुश्वार ज़रा सी

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

संग-संग चलो रे भाई

सितम्बर की एक शाम कुछ साथियों के साथ बैठकर गुनगुनाई गईं शुरूआती पंक्तियाँ बजती रहीं दिमाग में किसी टेप की तरह... दिसंबर के आखिरी सप्ताह में नाटक "भूख आग है" की तैयारी के दौरान कुछ और चीज़ों ने जगह बनाई... नतीजा यह गीत... जैसा भी है... पढ़िए... और जो कहना है... कहिये...


संग-संग चलो रे भाई
समझो इतनी बात भाई
हाथ में दो हाथ भाई रे, भाई रे

फिर से है वो रात आई
हर तरफ है घात भाई
हमारे घर की रोटियों तक
इनकी है निगाह भाई
इससे पहले बेच दें ये
हमको अपनी ही ख़ुशी
पहचानो इनकी जात भाई रे, भाई रे

इस घनेरी रात में
दुश्मनों के हाथ में
न तीर न तलवार है
मीठा सा हथियार है
ख़ुशी के ख़्वाब बेचकर
ये झोली अपनी लें न भर
जाग लो इस रात भाई रे, भाई रे

हसरतों को क्या हुआ
रास्तों को क्या हुआ
सहमी सी है हर हँसी
है रौशनी बुझी-बुझी
भोर आएगी मगर
तुम करो इतना अगर
तुम्हे सुबह का वास्ता
हाथ में दो हाथ भाई रे, भाई रे...
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